Monday, December 7, 2009

इच्छाएं

इच्छा....लगी मुझे एक मिथ्या सी...
कभी हंसाया कभी रुलाया


कभी हुई पूरी 
कभी रही अधूरी
कभी रही याद
कभी हुई बर्बाद


इच्छा....लगी मुझे एक मिथ्या सी...
कभी हंसाया कभी रुलाया


इसी के सहारे मैं उड़ा
इसी के सहारे मैं तैरा
इसी के सहारे मैं ऊपर चढ़ा
इसी के सहारे मैं नीचे गिरा


इच्छा....लगी मुझे एक मिथ्या सी...
कभी हंसाया कभी रुलाया


पर आजकल कोई इच्छा नहीं होती
क्यूंकि अगर होती तो पूरी नहीं होती
मन उद्दास है पर हताश नहीं
उम्मीद की चका-चौंध नहीं
पर उसके प्रकाश का दिया ही सही


इच्छा....लगी मुझे एक मिथ्या सी...
कभी हंसाया कभी रुलाया